आज फिर से आ पड़ी है वो जरुरत, बादलों के पार जाकर झाँकने की देखकर गहरा तिमिर क्या सोंचता है, छोड़ दे आदत वो अपनी काँपने की

रविवार, 24 जुलाई 2011

अहंकार और प्रेम की उपलब्धि

जो आदमी अपने अहंकार को मिटाने को राज़ी है ...........

जो आदमी अपने अहंकार को मिटाने को राज़ी है
वही केवल प्रेम को उपलब्ध हो सकता है ।
और हम केवल अपने अहंकार को भरने के लिए
 जीवन भर लगे रहते हैं ।
बहुत-बहुत रूपों में अहंकार को भरने की चेष्टा करते हैं ।
धन से भी , यश से भी ,पद से भी , ज्ञान से भी ,
और यहाँ तक कि त्याग से भी हम अहंकार को ही भरने कि कोशिश करते हैं ।
जीवन की सारी दिशाओं से हम एक ही काम करते हैं 
कि मैं अपने मैं को मजबूत कर लें ।
और मैं से बड़ा कोई झूठ नहीं है । मैं एकदम असत्य बात है ।
लहर का कोई अस्तित्व नहीं है ,अस्तित्व तो सागर का है ।
पत्ते का कोई अस्तित्व नहीं है , अस्तित्व तो वृक्ष का है ।
और वृक्ष का भी कोई अस्तित्व नहीं है ,
अस्तित्व तो पृथ्वी का है । पृथ्वी का भी क्या अस्तित्व है
चाँद-तारों और सूरज के बिना ?
असल में अस्तित्व समग्र का है ,टोटल का है ।
अस्तित्व खंड-खंड का नहीं ।
                                  - ओशो

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