एक प्यास ,एक पुकार ,एक अभीप्सा !
जीवन ही एक पुकार है |जीवन ही एक अभीप्सा है |
जीवन ही एक आकांक्षा है |
लेकिन आकांक्षा नरक की भी हो सकती है और स्वर्ग की भी |
पुकार अन्धकार की भी हो सकती है और प्रकाश की भी
अभीप्सा सत्य की भी हो सकती है और असत्य की भी
चाहे हमें ज्ञात हो और चाहे हमें ज्ञात न हो , अगर हमने अन्धकार
को पुकारा होगा ,तो हम अशांत होते चले जायेंगे |
अगर हमने असत्य को चाहा होगा ,तो हम अशांत होते चले जायेंगे
अगर हमने गलत को चाहा होगा ,तो शांत होना असंभव है
शांति छाया है -ठीक की चाह से पैदा होती है |
सम्यक चाह से शांति पैदा होती है
एक बीज अंकुरित होना चाहता है |
अंकुरित हो जाये तो आनंद से भर जायेगा ,
अंकुरित न हो पाए तो अशांत और पीड़ा अनुभव करेगा |
सरिता सागर होना चाहती है | सागर तक न पहुँच जाये ,
असीम से मिल जाए ,तो शांत हो जायेगी |
न पहुँच पाए ,भटक जाये मरुस्थलों में ,तो अशांत हो जायेगी |
दुखी हो जायेगी पीड़ित हो जायेगी |
किसी ऋषि ने गाया है :हे परमात्मा !
अन्धकार से आलोक की तरफ ले चलो
मृत्यु से अमृत की तरफ !
असत्य से सत्य की तरफ !
वही सारी मनुष्यता के प्राणों की आकांक्षा भी है ,वही पुकार है |
और अगर हम जीवन में शांत होते चले जा रहे हों
तो समझना चाहिए की हम उस पुकार की तरफ
चल रहे हैं जो जीवन के गहरे से गहरे प्राणों में छिपी है
और अगर हम अशांत हो रहे हों ,तो जानना चाहिए की हम
गलत दिशा में जा रहे हैं |
- ओशो





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